विधानसभा चुनाव परिणाम: छत्तीसगढ़ में नेता प्रतिपक्ष का नहीं जीत पाने का मिथक टूटा


रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के साथ ही कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष के कभी भी चुनाव नहीं जीतने के मिथक को तोड़ दिया है. हालांकि विधानसभा अध्यक्ष इस चुनाव में भी नहीं जीत सके.

वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हुई और जब पहली बार 2003 में विधानसभा के चुनाव कराए गए तब से लेकर 2013 के चुनाव तक नेता प्रतिपक्ष अपनी सीट नहीं बचा पाए थे. लेकिन इस वर्ष विधानसभा चुनाव में टीएस सिंह देव ने जीत हासिल कर इस मिथक को तोड़ दिया है. अंबिकापुर विधानसभा सीट से टी एस सिंह देव ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी अनुराग सिंह देव को 39,624 मतों से पराजित किया है.

2003 में नंद कुमार साय चुनाव हारे
वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद यहां अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी. इस दौरान बीजेपी के वरिष्ठ आदिवासी नेता नंद कुमार साय को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया था.

2003 में जब पहली बार राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तब मारवाही सीट से नंद कुमार साय ने मुख्यमंत्री अजीत जोगी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. साय चुनाव हार गए थे. हालांकि इस चुनाव में बीजेपी ने रमन सिंह के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी.

जब राज्य में बीजेपी की सरकार बनी तब कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा और वर्ष 2003 से 2008 के दौरान महेंद्र कर्मा विपक्ष के नेता रहे. जब 2008 में विधानसभा के चुनाव हुए तब कर्मा दंतेवाड़ा सीट से चुनाव हार गए. वर्ष 2008 में बीजेपी की दूसरी बार सरकार बनी.

2013 के चुनाव में रविंद्र चौबे साजा सीट से हार गए
जब राज्य में 2008 से 2013 के बीच बीजेपी की सरकार थी तब रविंद्र चौबे विपक्ष के नेता रहे और 2013 के चुनाव में रविंद्र चौबे साजा सीट से हार गए. इस दौरान राज्य में तीसरी बार रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी थी.

वर्ष 2013 में टीएस सिंह देव विपक्ष के नेता बने. इस वर्ष हुए चुनाव में सिंह देव अंबिकापुर से चुनाव मैदान में थे लेकिन इस चुनाव में जीत के साथ ही उन्होंने इस मिथक को भी तोड़ दिया कि नेता प्रतिपक्ष इस राज्य में चुनाव नहीं जीत सकते हैं.

यह मिथक है बरकरार
हालांकि बीजेपी के शासनकाल में किसी भी विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव नहीं जीत पाने का मिथक बरकरार है. इस वर्ष चुनाव में विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल कसडोल सीट से चुनाव हार गए हैं. इससे पहले वर्ष 2008 और 2013 के चुनाव में भी विधानसभा अध्यक्ष चुनाव हार चुके हैं.

वर्ष 2013 के चुनाव में गौरीशंकर अग्रवाल ने कांग्रेस के राजकमल सिंघानिया को 22,928 मतों से पराजित किया था. इसके बाद वह विधानसभा अध्यक्ष चुने गए थे लेकिन इस वर्ष हुए चुनाव में अग्रवाल कांग्रेस की प्रत्याशी शकुंतला साहू से 48,418 मतों से चुनाव हार गए हैं.

इससे पहले 2008 से 2013 के मध्य बीजेपी सरकार में धरमलाल कौशिक विधानसभा अध्यक्ष रहे लेकिन वह 2013 के चुनाव में बिल्हा सीट में कांग्रेस के उम्मीदवार सियाराम कौशिक से चुनाव हार गए थे.

इसी तरह इससे पहले 2003 से 2008 के मध्य बीजेपी के प्रथम शासनकाल में प्रेमप्रकाश पांडेय विधानसभा अध्यक्ष थे लेकिन 2008 के चुनाव में वह भिलाई नगर सीट में कांग्रेस के बदरूददीन कुरैशी से चुनाव हार गए थे.

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुका है. राज्य में कांग्रेस ने 90 सीटों में से 68 सीटों पर जीत हासिल की है. वहीं बीजेपी को 15 सीट ही मिली है. जबकि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ :जे: को पांच सीट तथा बहुजन समाज पार्टी को दो सीटों पर कामयाबी मिली है.

(इनपुट – भाषा)





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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 : जानिए किस सीट पर कौन जीता



छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटों के लिए हुई मतगणना के बाद राज्य में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला है. पार्टी ने 68 सीटों पर जीत दर्ज की. जबकि 15 सालों से सत्ता में राज कर रही बीजेपी के खाते में 15 ही सीटें आईं. वहीं, दो सीटों पर बसपा और 5 सीटें जनता कांग्रेस के खाते में गई. आइए देखते हैं राज्य की किस विधानसभा सीट पर किस पार्टी ने जीत हासिल की.



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ZEE जानकारी: क्या कहते हैं मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजे?


अब सबसे पहले मध्य प्रदेश की बात कर लेते हैं. क्योंकि मध्य प्रदेश में समीकरण लगातार बदल रहे हैँ. 

मध्य प्रदेश में विधानसभा की 230 सीटें हैं. और बहुमत के लिए 116 सीटें चाहिएं. लेकिन बहुमत के इस आंकड़े को कोई भी पार्टी हासिल नहीं कर पाई है. 
कभी कांग्रेस नज़दीक आती है तो कभी बीजेपी. 

ताज़ा स्थिति ये है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी 109 सीटों पर और कांग्रेस 114 सीटों पर आगे है. 

जबकि BSP के खाते में 2 सीटें दिख रही हैं. और अन्य को 5 सीटें मिलती दिख रही हैं.

आपको बता दें कि ये Final Figure नहीं है. मध्य प्रदेश में अभी भी वोटों की गिनती चल रही है. 

मध्य प्रदेश में 12 सीटें ऐसी हैं जहां पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच वोटों का अंतर सिर्फ 1000 वोटों के आसपास है . यही वजह है कि कभी बीजेपी आगे निकल रही है तो कभी कांग्रेस . मध्य प्रदेश में अभी 2 से 3 राउंड के बीच वोटों की गिनती बाकी है . रात साढ़े 10 बजे तक मध्य प्रदेश के परिणाम सामने आ सकते हैं . बड़ी बात ये भी है कि मध्य प्रदेश में अब तक बीजेपी के 12 मंत्री चुनाव हार चुके हैं . 

यहां बीजेपी और कांग्रेस को समान वोट मिले हैं. दोनों को करीब 41% वोट मिले हैं. यहां पिछली बार के मुकाबले बीजेपी का वोट 4% कम हुआ है, जबकि कांग्रेस के Vote Share में 5% की बढ़ोतरी हुई है. 

मध्य प्रदेश में बीजेपी के खराब प्रदर्शन की सबसे बड़ी वजह है… सत्ता विरोधी लहर . मध्य प्रदेश में पिछले 15 वर्षों से बीजेपी की सरकार थी . कांग्रेस पार्टी… बीजेपी के खिलाफ इस नाराज़गी का फायदा उठाने में कामयाब रही . 

मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने सबसे पहले किसानों के मुद्दे को उठाया . जून 2017 में मंदसौर में किसानों पर लाठीचार्ज हुआ और गोलियां चलीं… जिसमें 6 किसान मारे गए . इस घटना के बाद से मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ . पिछले एक वर्ष से मध्य प्रदेश में किसानों का आंदोलन बहुत तेज़ हो गया था. किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल रहा था . 

मध्य प्रदेश में 70 प्रतिशत लोग खेती करते हैं . वर्ष 2009 से 2014 के बीच मध्य प्रदेश में कृषि विकास दर 12 प्रतिशत थी . लेकिन वर्ष 2014 से वर्ष 2017 के बीच मध्यप्रदेश की कृषि विकास दर घटकर 9 प्रतिशत हो गई . कांग्रेस ने चुनाव में किसानों की इन समस्याओं को ज़ोर-शोर से उठाया और किसानों का कर्ज़ माफ करने का वादा भी किया . जिसके बाद किसान… कांग्रेस के ज़्यादा करीब हो गए . 

आपको याद होगा कुछ दिन पहले देश भर के किसान दिल्ली में आए थे. उनमें मध्य प्रदेश के किसान भी थे. लेकिन लगता है बीजेपी ने इन सारी तस्वीरों को हल्के में ले लिया और अंत में इसका नुकसान हुआ

भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से भी मध्य प्रदेश में बीजेपी को नुकसान हुआ . कांग्रेस के नेताओं ने अपनी चुनावी रैलियों में व्यापम के मामले में whistle-blowers और गवाहों की मौत के मुद्दे को उठाया . व्यापम घोटाले की वजह से शिवराज सिंह चौहान की छवि को काफी नुकसान हुआ . 

लेकिन बीजेपी को सबसे बड़ा झटका दिया… सवर्णों ने . केंद्र सरकार ने SC/ST Act में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया… जिसमें आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई थी . केंद्र सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा विरोध मध्य प्रदेश में हुआ . वर्ष 2014 में लोकसभा के चुनाव में मध्य प्रदेश में 48 प्रतिशत सवर्णों ने बीजेपी को Vote दिया था . लेकिन इस बार बीजेपी से नाराज़ सवर्णों ने मध्य प्रदेश में अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी बनाई और चुनाव भी लड़ा . 

इसके अलावा Social Media पर भी सवर्णों के संगठनों ने चुनाव में NOTA का Button दबाने का अभियान चलाया . NOTA का मतलब है… None of the above यानी… किसी भी पार्टी को Vote ना देना . मध्य प्रदेश में 1.5 प्रतिशत लोगों ने NOTA का Button दबाया . मध्य प्रदेश के 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने किसी भी पार्टी को वोट नहीं दिया .

मध्य प्रदेश में साधु-संतों की नाराज़गी भी शिवराज सिंह चौहान पर भारी पड़ी . मध्य प्रदेश की सरकार ने कई संतों को मंत्री का पद भी दिया . लेकिन इसके बाद भी नाराज़गी कम नहीं हुई. 

अब मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान की बात करते हैं। 

राजस्थान में विधासभा की 200 सीटें हैं, लेकिन चुनाव 199 सीटों पर हुआ था। 
आज आए नतीजों में कांग्रेस को 99 सीटें मिली हैं। 
जबकि बीजेपी को 73 सीटें मिली हैं, जबकि अन्य के खाते में 27 सीटें आई हैं।

राजस्थान में बीजेपी को करीब 39% और कांग्रेस को 39.2% वोट मिले हैं। बीजेपी को यहां करीब 7% वोट शेयर का नुकसान हुआ है, तो कांग्रेस को 6% वोट शेयर का फायदा हुआ है। 

राजस्थान में बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह थी… कार्यकर्ताओं की उपेक्षा । मुख्यमंत्री के रूप में वसुंधरा राजे सिंधिया ने एक महारानी की तरह व्यवहार किया । मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद 4 वर्षों तक वसुंधरा राजे सिंधिया और बीजेपी के कार्यकर्ताओं का संवाद एकदम ना के बराबर था । राजस्थान में बीजेपी के टिकट पर लड़ रहे 14 मंत्री चुनाव हार गए । इससे भी साफ पता चलता है कि राजस्थान में बीजेपी के बड़े नेताओं का संवाद, जनता के साथ एकदम टूट गया था । राजस्थान की जनता की नाराज़गी पार्टी को लेकर नहीं बल्कि चेहरे को लेकर थी । राजस्थान में वसुंधरा के खिलाफ ये नारा खूब चर्चा में रहा कि PM से बैर नहीं… वसुंधरा की खैर नहीं । यानी… वसुंधरा राजे सिंधिया ने राजस्थान में बीजेपी के लिए जीत का रास्ता बंद कर दिया । 

वसुंधरा के खिलाफ गुस्सा इतना ज़्यादा था कि राजस्थान में बीजेपी के लिए 50 सीटें जीतना भी मुश्किल था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह के चुनावी प्रबंधन की वजह से राजस्थान में बीजेपी की स्थिति बेहतर हुई और वो सम्मानजनक सीटें प्राप्त कर पाई। 

राजस्थान के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व ने समझदारी से काम लिया । कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान में किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं किया । अशोक गहलोत और सचिन पायलट का राजस्थान में अच्छा जनाधार है । लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इन दोनों का नाम मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर आधिकारिक रूप से पेश नहीं किया । दोनों ही नेताओं के समर्थकों को लगा कि दोनों में से कोई भी नेता मुख्यमंत्री बन सकता है इसलिए सभी कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस पार्टी के लिए एकजुट होकर प्रचार किया । 

फिर भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच के संघर्ष का असर टिकट बंटवारे पर पड़ा । दोनों के आपसी संघर्ष की वजह से कांग्रेस के बहुत से नेताओं के टिकट कट गए । कांग्रेस के इन्हीं बागी नेताओं ने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। इनमें से बहुत सारे निर्दलीय चुनाव जीत गए । अगर ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस पार्टी, राजस्थान में 130 से भी ज़्यादा सीटें जीत सकती थीं । 

अशोक गहलोत इस वक्त कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे नज़र आ रहे हैं । राजस्थान की आने वाली सरकार में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की भूमिका महत्वपूर्ण होगी । लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा ? इसका फैसला कल राजस्थान में कांग्रेस पार्टी के विधायक दल की बैठक के बाद हो सकता है। 

इस बीच सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच महात्वाकांक्षा की दरारें नज़र आ रही हैं । आज जयपुर में कांग्रेस पार्टी के ये दोनों बड़े नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक साथ नज़र आए । लेकिन दोनों के बीच की दूरियां साफ नज़र आ रही थीं । ये दोनों नेता अलग अलग बैठे हुए नज़र आ रहे थे ।

दिलचस्प तस्वीरें उस वक्त सामने आईं जब कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने ही सचिन पायलट और अशोक गहलोत को एक साथ लाकर उनके हाथ मिलवाने की कोशिश की । उस वक्त इन दोनों ही नेताओं ने हाथ तो मिलाया लेकिन महात्वाकांक्षा की दरारें साफ़ दिख रही थीं। 

अब छत्तीसगढ़ की बात करते हैं। यहां बीजेपी की बुरी तरह से हार हुई है। 

वहां बीजेपी को सिर्फ 16 सीटें मिली हैं। जबकि कांग्रेस को 68 सीटें मिली हैं। 

अजीत जोगी और मायावती के गठबंधन को 6 सीटें मिली हैं। 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 43% से ज्यादा वोट मिले हैं, जबकि बीजेपी को 32% वोट मिले हैं। 2013 के मुकाबले कांग्रेस के वोट 3% बढ़े हैं और बीजेपी के वोट करीब 8% कम हुए हैं। 
छत्तीसगढ़ में रमन सिंह 2003 से बीजेपी की सरकार चला रहे थे। यानी वो पिछले 15 साल से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे। 
लेकिन इस बार उन्हें सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा । हालांकि उन्हें शायद इस बात की उम्मीद नहीं होगी कि वो इतनी बुरी तरह से हार जाएंगे। 
रमन सिंह की हार में सबसे बड़ी वजह है 15 वर्षों की Anti Incumbency यानी सत्ता विरोधी लहर। 

रमन सिंह को किसानों का गुस्सा भी झेलना पड़ा। छत्तीसगढ़ में किसान लगातार फसलों के दाम को लेकर बीजेपी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। और इसका नुकसान बीजेपी को चुनावों में उठाना पड़ा। 

रमन सिंह के खिलाफ किसानों की इस नाराज़गी का फायदा कांग्रेस ने उठाया। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में किसानों की कर्ज़माफी का वादा किया, और ये दांव काम कर गया।

आज रमन सिंह ने पूरी शालीनता के साथ अपनी हार स्वीकार कर ली है।

अब NOTA की बात कर लेते हैं। मध्य प्रदेश में NOTA ने बहुत से नेताओं के समीकरण बिगाड़े हैं। 

यहां करीब 5 लाख 22 हज़ार से ज्यादा लोगों ने NOTA को वोट दिया। 

ये कुल वोटिंग प्रतिशत का 1.5% है। 

जबकि छत्तीसगढ़ में भी करीब 2% वोट NOTA को पड़े हैं। 

राजस्थान में भी करीब 4 लाख 66 हज़ार से ज्यादा लोगों ने NOTA को वोट दिया। 

यानी कुल मिलाकर जीत का फर्क नोटा से तय हो रहा है। ये साफ तौर पर सत्ता विरोधी लहर है। 





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छत्तीसगढ़ में शुरुआती रुझानों में कांग्रेस को बहुमत, 52 सीटों पर आगे


रायपुरः छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव (Chhattigarh Assembly Elections 2018) में आज डेढ़ घंटे की मतगणना के बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह को कांग्रेस उम्मीद्वार करुणा शुक्ला से कड़ी टक्कर मिल रही है. सामने आ रहे रुझानों में यहां भाजपा पीछे नजर आ रही है. जिससे भाजपा प्रत्याशियों की टेंशन बढ़ी हुई नजर आ रही है. राजनंदगांव से सीएम रमन सिंह लगातार आगे-पीछे चल रहे हैं. वहीं बात करें छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की तो वह मरवाही विधानसभा सीट पर तीसरे नंबर पर चल रहे हैं. बता दें राज्य के हर जिले के स्ट्रॉन्ग रूम में विधानसभावार 14-14 टेबल लगाए गए हैं.

– कांग्रेस 50, भाजपा 26, JCC 5 और अन्य एक सीट पर आगे.

– मरवाही विधानसभा सीट पर जोगी पिछड़े, बीजेपी-कांग्रेस आगे.

– कांग्रेस 50, भाजपा 30, JCC 5 और अन्य एक सीट पर आगे.
 

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छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी

– सामने आ रहे शुरुआती रुझान में कांग्रेस, भाजपा को कड़ी टक्कर देती नजर आ रही है. राज्य में कांग्रेस 48, भाजपा 30, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ 5 और 1 सीट पर अन्य आगे चल रहे हैं.

– बिलासपुर से भाजपा अमर अग्रवाल आगे, मस्तूरी से भाजपा डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी, बिल्हा से भाजपा धरमलाल कौशिक,  कोटा से JCCJ डॉ. रेणु जोगी आगे, तखतपुर से कांग्रेस डॉ. रश्मि सिंह,  बेलतरा से भाजपा रजनीश सिंह मरवाही से JCCJ अजित जोगी चल रहे है आगे..

– सीतापुर विधानसभा सीट से
राउंड-(1)
बीजेपी के प्रोफेसर गोपाल राम को 1311 और कांग्रेस प्रत्याशी अमरजीत भगत को 5133 वोट

– अम्बिकापुर विधानसभा सीट से
राउंड-(1)
बीजेपी प्रत्याशी अनुराग सिंह देव से कांग्रेस के टी एस सिंह देव 3000  वोट से आगे

– खरसिया से बीजेपी प्रत्याशी और पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी पीछे.

– रायपुर दक्षिण से मंत्री राजेश मूणत पीछे. कांग्रेस प्रत्याशी विकास उपाध्याय आगे. कुरूद से मंत्री अजय चंद्राकर पीछे, लक्ष्मीकांत साहू आगे.

– बीजेपी 33, कांग्रेस 44, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ 5 और अन्य 1 सीट पर आगे.

– रायपुर में बीजेपी 5 और कांग्रेस 8 सीटों पर आगे नजर आ रही है, जबकि दुर्ग में बीजेपी 2 और कांग्रेस 6 सीटों पर आगे चल रही है.

– छत्तीसगढ़ में चार सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी काफी आगे चल रहे हैं.

– छत्तीसगढ़ में सामने आए रुझानों में 7 सीटों में से 5 पर बीजेपी आगे नजर आ रही है.

– मरवाही से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रमुख अजीत जोगी आगे.

– बैकुंठपुर, भरतपुर-सोनहट, मनेंद्रगढ़ से बीजेपी आगे.

– राज्य में बीजेपी 20, कांग्रेस 24 और जनता कांग्रेस 3 सीट पर आगे.

– बता दें छत्तीसगढ़ में मतगणना शुरू हो चुकी है. अधिकारियों के मुताबिक मतगणना के दौरान सबसे पहले पोस्टल बैलेट की गिनती की जाएगी.

– छत्तीसगढ़ में पहला रुझान भाजपा के पक्ष में नजर आ रहा है.

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव की मतगणना आज, कड़ी सुरक्षा के बीच होगी काउंटिंग

बता दें छत्तीसगढ़ में इस बार भाजपा और कांग्रेस ने अपने 90-90 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारे हैं. जबकि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने 55, बसपा ने 35 और अन्य मिलाकर 1269 प्रत्याशी हैं. राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के अधिकारियों ने बताया कि मतगणना के लिए 5184 गणनाकर्मी और 1500 माइक्रोऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं. प्रत्येक हॉल में मतगणना के लिए 14 टेबल, रिटर्निंग ऑफिसर मेज और डाक मतपत्रों की गणना की मेज होगी. वहीं मतगणना केंद्र के आस-पास किसी भी नेता-मंत्री और राजनीतिक पार्टियों से संबंध रखने वाले लोगों की आवाजाही पर सख्त मनाही है.

मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद बने 26 वें राज्य का नाम क्यों पड़ा छत्तीसगढ़, जानें क्या है वजह

अधिकारियों ने बताया कि मतगणना केन्द्रों में त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है, जहां प्रत्येक स्तर पर पहचान पत्र की जांच के बाद ही प्रवेश करने दिया जाएगा. वहीं मतगणना और सारणीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी की जाएगी. ताकि बाद में अगर कोई भी दल चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाता है तो उसे इसके साक्ष्य दिए जा सकें कि मतगणना में किसी भी तरह का पक्षपात नहीं किया गया है. अधिकारियों के मुताबिक उन्होंने यह कदम मतगणना में पारदर्शिता बनाए रखने के चलते उठाया है.

बता दें छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव संपन्न हुए थे. जिसमें पहले चरण में 18 सीटों के लिए 12 नवंबर को और दूसरे चरण में 72 सीटों के लिए 20 नवंबर को चुनाव हुए थे. प्रदेश में कुल 1,84,80,997 मतदाता हैं जिनमें से 31 लाख 80 हजार मतदाता पहले चरण में और दूसरे चरण में 1 करोड़ 53 लाख 983 मतदाता थे. इनमें से कुल 76.35 फीसदी वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. बता दें 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 43 सीटों पर जीत दर्ज कराते हुए सरकार बनाई थी और इस बार भी भाजपा भारी बहुमत से जीत दर्ज करने का दावा कर रही है. भाजपा ने इस बार राज्य में 65+ का टारगेट बनया था.





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Why Chhattisgarh got the name of 26th state after separation from Madhya Pradesh, what is the reason । मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद बने 26 वें राज्य का नाम क्यों पड़ा छत्तीसगढ़, जानें क्या है वजह


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छत्तीसगढ़ की राजनीति में सादगी और सरलता के लिए मशहूर है ‘राजा’ टीएस सिंह देव


नई दिल्लीः छत्तीसगढ़ की राजनीति में टीएस सिंह देव का नाम वरिष्ठ नेताओं में शुमार होता है. 31 अक्टूबर 1951 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में जन्में टीएस सिंह देव का पूरा नाम त्रिभुवनेश्वर शरण सिंह देव है. टीएस सिंह देव वर्तमान में छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष है. इस बार उन्हें कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार भी माना जा रहा है.

टीएस सिंह देव सरगुजा रियासत के राजा हैं और लोग उन्हें प्यार से टीएस बाबा के नाम से पुकारते हैं. टीएस बाबा ने इतिहास में एमए किया है. वह भोपाल के हमीदिया कॉलेज के छात्र रहे हैं.

राजनीतिक सफर
टीएस सिंह देव के राजनीतिक जीवन की शुरुआत साल 1983 में अंबिकापुर (तब मध्य प्रदेश) नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष चुने जाने के साथ हुई. सार्वजनिक जीवन में उनके सीधे, सरल स्वभाव और उदार व्यवहार के कारण ही वह 10 साल तक इस पद पर बने रहे. साल 2003 में टीएस सिंह देव छत्तीसगढ़ राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे. 

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फोटो- फेसबुक- TS BABA

बेहद टक्कर के मुकाबले से जीता पहला चुनाव
साल 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में टीएस सिंह देव ने पहली बार चुनाव लड़ा. वह सरगुजा जिले की अंबिकापुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे और उन्होंने बीजेपी के अनुराग सिंह देव को 948 वोटों से हराया. साल 2013 के चुनाव में भी टीएस सिंह देव अंबिकापुर से ही मैदान में उतरे इस बार भी उनका मुकाबला बीजेपी के अनुराग सिंह देव से ही था. साल 2013 के चुनाव में टीएस बाबा ने अनुराग सिंह को 19 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. 6 जनवरी 2014 को टीएस सिंह देव छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता विपक्ष चुने गए. 

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फोटो- फेसबुक- TS BABA 

टीएस सिंह देव 2008 से अंबिकापुर विधानसभा सीट से चुनाव जीतते आ रहे हैं. इस बार भी वे इसी सीट से चुनाव मैदान में है और उनका मुकाबला एक बार फिर बीजेपी अनुराग सिंह देव से है.

राज्य के सबसे अमीर विधायक
साल 2013 में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान दिए गए शपथ पत्र के मुताबिक टीएस सिंह देव 500 करोड़ से अधिक की संपत्ति के मालिक हैं. वह छत्तीसगढ़ के सबसे अमीर विधायक हैं. अंबिकापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते समय दाखिल किए गए अपने में टीएस बाबा ने 514 करोड़ की संपत्ति का शपथपत्र दिया था. 

अंबिकापुर में अधिकांश संपत्ति के मालिक हैं टीएस बाबा 
सरगुजा रियासत के राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले टीएस सिंह देव की अंबिकापुर में इतनी संपत्ति है कि उन्हें खुद भी नहीं पता है. इलाके में जहां नजर जाती है वहां टीएस बाबा के घराने की संपत्ति ही दिखाई देती है. फिर चाहे वो  सरकारी इमारते (स्कूल-अस्पताल आदि) हों, मकान या यात्रियों के लिए बनाए गए होटल अधिकांश पर इन्हीं के राज परिवार का मालिकाना हक है. इतनी बड़ी रियासत का मालिक होने के बावजूद टीएस बाबा का रहन सहन बेहद सादगी भरा है. वह हमेशा सिंपल कुर्ते पायजामे में ही नजर आते हैं. 





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छत्तीसगढ़ चुनावः हमेशा से ही राज्य की सियासत का बड़ा नाम रहे हैं अजीत जोगी


रायपुरः भारतीय राजनीति में अजीत जोगी का नाम बड़े नेताओं में शुमार होता है. कांग्रेस पार्टी से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहे हैं. 29 अप्रैल 1946 को बिलासपुर के पेंड्रा में जन्में अजीत प्रमोद कुमार जोगी के दादाजी हिंदू धर्म के सतनामी समाज से ताल्लुक रखते थे. बाद में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था. अजीत जोगी ने भोपाल के मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से मकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और साल 1968 में यहां से गोल्ड मेडलिस्ट रहे. अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद अजीत जोगी ने रायपुर के गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर के रूप में सेवाएं दीं.

इसी दौरान उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के लिए हो गया, बाद में वह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानि आईएएस के लिए भी चुन लिए गए. भारतीय प्रशासनिक सेवा के दौरान साल 1981 से 1985 तक अजीत जोगी इंदौर के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर रहे. 

जानकार बताते हैं कि इसी दौरान अजीत जोगी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम अर्जुन सिंह के संपर्क में आए. जोगी की गिनती अर्जुन सिंह के चहेते अधिकारियों में होती थी. लेकिन जोगी के राजनीतिक जीवन की शुरुआज पूर्व पीएम राजीव गांधी के संपर्क में आने के बाद हुई.

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1986 से 87 के बीच अजीत जोगी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण समिति की जिम्मेदारी दी गई. 1986 से लेकर 98 तक अजीत जोगी दो बार के राज्यसभा सदस्य रहे.1998 में जोगी पहली बार रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र से लिए चुने गए. इसी दौरान उन्हें कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी सौंपी.

नए राज्य के साथ मिली नई जिम्मेदारी
साल 2000 में छत्तीसगढ़ को अलग राज्य घोषित किया गया और अजीत जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. ये जिम्मेदारी जोगी ने साल 2003 तक संभाली. 2003 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गई और राज्य में पहली बार रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी. इन चुनावों में जोगी खुद मरवाही सीट से मैदान में थे और उन्होंने बीजेपी के नंद कुमार साई को 54 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. इन चुनावों में कांग्रेस ने 37 सीटें जीती थी. 

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लोकसभा चुनाव में जीत के बाद भी केंद्र में नहीं मिला मौका 
इसके बाद साल 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में अजीत जोगी ने कांग्रेस की तरफ से छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट से चुनाव लड़ा. इस दौरान उनका मुकाबला कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल से था. जोगी ने विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेता को हराकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपना कद सबसे ऊपर कर लिया. इन चुनावों में केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी लेकिन अजीत जोगी को सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई. जोगी अभी भी छत्तीसगढ़ की राजनीति में ही खुद को आजमाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने सांसद का अपना कार्यकाल पूरा ना करके वापस विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बनाया. 

नहीं छूटा राज्य की राजनीति का मोह 
साल 2008 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में जोगी एक बार फिर मरवाही से मैदान में उतरे. इस बार भी राज्य में कांग्रेस की हार हुई लेकिन अजीत जोगी ने बंपर वोटों से चुनाव जीता. अजीत जोगी ने बीजेपी के ध्यान सिंह पोर्ते को 42 से ज्यादा हराया था. इसके बाद साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में जोगी मैदान में नहीं उतरे. छत्तीसगढ़ बनने के बाद ऐसा पहली बार हुआ जब अजीत जोगी ने विधानसभा का अपना कार्यकाल पूरा किया. 2013 में हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी मरवाही विधानसभा सीट से अपने बेटे अमित जोगी को मैदान में उतारा. अमित जोगी ने बीजेपी समीरा पैकरा को 46 से ज्यादा वोटों से हराया था. इसके बाद साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में अजीत जोगी ने महासमुंद लोकसभा सीट से एक बार फिर ताल ठोकी. लेकिन इस बार जोगी मोदी हवा में बीजेपी के चंदूलाल साहू से 1217 वोटों से हार गए. 

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बेटा, पत्नी और बहू मैदान में
इस बार के विधानसभा चुनाव में राज्य के पहले मुख्यमंत्री जोगी पहली बार कांग्रेस पार्टी से अलग चुनाव लड़ रहे हैं. इस बार अजीत जोगी अपनी अलग पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (JCC-J) के साथ मैदान में हैं.  राज्य की 90 सीटों में जोगी की पार्टी 55 सीटों पर चुनाव लड़ रही है बाकि 35 सीटों पर जेसीसीजे ने बीएसपी को समर्थन किया है.

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इस बार अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी के अलावा उनकी बहू ऋचा जोगी भी चुनाव मैदान में है. ऋचा जोगी अकलतरा सीट से चुनाव मैदान में है. वहीं कोटा विधानसभा सीट से जेसीसी के टिकट पर अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी भी चुनाव मैदान में है.  





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Two leaders of Janta Congress fought in Jogi Bungalow । छत्तीसगढ़ः जोगी बंगले में गजराज पगरिया और विजय निजामन में मारपीट, थाने पहुंचा मामला


बैठक के दौरान अजीत जोगी और अमित जोगी दोनों ही बंगले में थे, लेकिन बैठक में मौजूद नहीं थे. इसी दौरान किसी बात को लेकर विजय निजामन और गजराज पगारिया में बहस शुरू हो गई.

छत्तीसगढ़ः जोगी बंगले में गजराज पगरिया और  विजय निजामन में मारपीट, थाने पहुंचा मामला

(फाइल फोटो)





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तीन राज्यों में कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगे सिद्धू, छत्तीसगढ़ में शुक्रवार से शुरू करेंगे अभियान


कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पंजाब सरकार के मंत्री एवं पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को स्टार प्रचारक के तौर पर उतारने जा रही है। सिद्धू कांग्रेस के पक्ष में वोट मांगने की शुरुआत शुक्रवार को छत्तीसगढ़ से करेंगे।

तीन राज्यों में कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगे सिद्धू, छत्तीसगढ़ में शुक्रवार से शुरू करेंगे अभियान

(फाइल फोटो)





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छत्तीसगढ़ की चुनावी सभा में राहुल ने मोदी पर सिर्फ उद्योगपतियों के कर्ज माफी का लगाया आरोप


चारमा (छत्तीसगढ़): कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शनिवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल के दौरान चुनिंदा 15 उद्योगपतियों का 3.5 लाख करोड़ रूपये का कर्ज माफ किया.

राज्य विधानसभा चुनाव के लिए यहां एक रैली को संबोधित करते हुये राहुल गांधी ने कहा कि वह चाहते हैं कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पांच सालों में कृषि का केन्द्र बन जाएं और देश को खाना, फल और सब्जियां मुहैया कराए.

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘पिछले चार-पांच सालों में मोदीजी ने 15 सबसे धनी लोगों को 3.5 लाख करोड़ रूपया दिया. जबकि देश में मनरेगा योजना चलाने के लिए सालाना 35,000 करोड़ रूपये की जरूरत होती है, उन्होंने उस राशि का दस गुना धन 15 चुनिंदा उद्योगपतियों का माफ कर दिया है.’’ 

राहुल ने कहा, ‘‘मोदी ने राजकोष की चाभी 15 चुनिंदा लोगों को दे दी है लेकिन कांग्रेस यह चाभी किसानों, युवाओं, गरीबों, महिलाओं को आदिवासियों को देना चाहती है.’’ 90 सदस्यीय छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए दो चरणों में 12 और 20 नवंबर को मतदान होगा.

मध्यप्रदेश में विधानसभा के लिए 28 नवंबर को मतदान होगा. चुनाव परिणामों की घोषणा 11 दिसंबर को की जाएगी.

(इनपुट भाषा से)





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